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मनुस्मृति हिन्दू धर्म  मानवजाति का प्राचीन  धर्मशास्त्र व प्रथम संविधान (स्मृति) है। सन 1776 में ब्रिटिश फिलॉजिस्ट सर विलियम जोंस द्वारा मनुस्मृति को सर्व प्रथम अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। अत: हम गौरवपूर्ण कह सकते हैं कि अंग्रेजी मे Translate होने वाला हमारा पहला संस्कृत ग्रंथ मनुस्मृति है। मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिनमें 2684 श्लोक हैं। वेद मे लिखा है कि जो धर्म मनु जी ने कहा है वही मनुष्य कल्याण कारक है। श्री मनु जी ने कहा है कि वेद और स्मृतियों मे कहे हुए धर्म को जो मनुष्य करता है वह मनुष्य इस लोक मे कीर्ति को एवं परलोक मे मोक्ष को प्राप्त होता है। सबसे पहले राजा मनु ने वेदों के ज्ञान को एक व्यवस्था अर्थात मनुस्मृति में ढाला था। श्रुति नाम वेद का है और स्मृति नाम धर्म शास्त्र का।

उद्देश्य है सनातन जाग्रति
यही श्री राम, श्री कृष्ण एवं महात्मा बुद्ध का उद्देश्य था
"वेद ही सनातन है और वेदिक ज्ञान ही सनातन धर्म" है। हमने चारों वेदों के ज्ञान को 'सनातन वेद वाणी' पॉकेट पुस्तक मे समाहित करने का प्रयास किया है।  जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य वेद के वास्तविक ज्ञान का पाठ कर सके और वास्तविक धर्म के प्रति जागरूक हो। माँ महामाया कि अनुकंपा से सन 2000 मे प्रारंभ किया गया यह कार्य, वर्तमान वर्ष 2023 मे सनातन वेद सार “वेद वाणी“ First Pocket Ved रूप मे प्रस्तुत है।  “वेद वाणी“ First Pocket Ved प्रत्येक सनातनी तक पहुंचना संभव न देखकर, हमने positivethoughtcenter.com वेबसाईट बनाने का निश्चय किया, जो वर्तमान मे “वेद वाणी” सहित अन्य सनातन ग्रंथ जैसे वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, शिव स्त्रोत, दुर्गा सप्तसती, बजरंग बाण सहित अनेक पुरातन ग्रंथ लेकर उपस्थित है। जिन्हे आप पीडीएफ़ फॉर्मेट मे पढ़ सकते हैं, ऑडियो फॉर्मेट में सुन सकते हैं और अपनी आवश्यकता अनुसार डाउनलोड भी कर सकते हैं, जो पूर्णता निशुल्क है। हमारा उद्देश्य है सनातन जाग्रति, यही श्री राम, श्री कृष्ण तथा महात्मा बुद्ध का उद्देश्य था और यही ईश्वर आराधना है। हमने positivethoughtcenter.com रूप मे सनातन जाग्रति का एक दिया जलाया है ईश्वर से प्रार्थना है “वेद वाणी“ का प्रकाश प्रत्येक सनातनी तक पहुंचे।
योगी अखिलेश
सकारात्मक विचार केंद्र
प्रश्न- क्या सब कुछ ईश्वर पर आधारित है?
उत्तर- नहीं, सबकुछ ईश्वर पर आधारित नहीं।
ज्ञान का उपयोग मानव जीवन के प्रारंभ से ही ऋषि-मुनि, देव-दानव तथा मनुष्य निरंतर करते आ रहे है।  तुलसीदास जी ने रामचारित मानस मे लिखा है कि                                                                                           
“सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहहु मुनिनाथ, हानि लाभ जीवन मरन जस अपजस विधि हाथ"
राम के वनवास के बाद भरत बहुत विचलित हुए। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा प्रभु आप तो संसार के सबसे श्रेष्ठ मुनि व महाज्ञानी हैं। आपने राम के राजतिलक का ऐसा मुहूर्त कैसे निकाल दिया कि महाराज दशरथ की मृत्यु हुई और राम वनवास गए। यह प्रश्न सुन कर वशिष्ठ मुनि ने इस दोहे का उदहारण भरत को दिया था। जिसका अर्थ है कि महर्षि ने दुखी होकर कहा- हे भरत, भाग्य बड़ा बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश व अपयश विधाता के नियम या कानून पर निर्भर है, प्राणी के हाथ में नहीं।
परन्तु शारीरिक और मानसिक सुख-दुख हमारे शरीर मे होने वाली क्रियाये हैं भाग्य कि लेखनी नहीं। अत: इनसे उपजने वाले कष्टों को योग के माध्यम से नष्ट किए जा सकता  है।
सुख-दुख उपजे सोच से मन मे पीड़ा होय
रोग है उपजे पेट से जीवन भारी होय।                                                 
जो मानव योगी बने हो जाए वो पार
कलयुग मे हनुमान की महिमा अपरंपार।।
योग एक ऐसा मार्ग है जिसके द्वारा कुछ भी असंभव नहीं आवश्यकता है तो सिर्फ एकाग्रता की। जो शक्ति मंत्रों तंत्रों या यंत्रों के द्वारा पाई जाती हैं वो एक निश्चित समय तक ही कार्य करती है। वहीं योगिक शक्ति इस जन्म मे ही नहीं बल्कि अन्य जन्म मे भी फलदायक है। योग विद्या भी सम्मोहन विद्या के समान एकाग्रता पर निर्भर करती है। जिस प्रकार एक सम्मोहनकर्ता के लिए, एकाग्रता का नियत अभ्यास करना आवश्यक है उसी प्रकार ही योगी को स्वयं सम्मोहन के लिए हठयोग द्वारा एकाग्रता का अटूट अभ्यास करना पड़ता है।  क्यों कि 'स्वयं के द्वारा स्वयं को सम्मोहित कर लेना ही समाधि है'।
इस पृथ्वी के प्रत्येक मनुष्य मे सम्मोहन शक्ति स्वत: ही विद्यमान है। परंतु जानकारी न होने के कारण अधिकतम मनुष्य इस शक्ति से बहुत दूर है और जो इसके जानकार है वह सिर्फ धन कमाने के लिए ही इसका उपयोग कर रहे  है। यह शक्ति प्रत्येक मनुष्य को ब्रह्म के द्वारा स्वत: ही दी गई है जिसे योग के माध्यम से और अधिक जाग्रत अवस्था मे ले जाया जाता है। यही सम्मोहन कि उच्च अवस्था ही समाधि कहलाती है।
यहा मै आपको इस बात का बताना उचित समझूँगा कि व्यायाम योग नहीं है। योग एक साधना है। योग मे आसन का भी विशेष महत्व है। जिस प्रकार से कुकर बिना सीटी के भाप ऊर्जा को नहीं रोक सकता उसी प्रकार बिना सही आसन के किया हुआ योग प्रकृति से अर्जित की हुई ऊर्जा को नहीं रोक सकता और योगी को असफलता हाथ लगती है।  अत: आसन भी साधना का एक विशेष अंग है। मनुष्य आसन के द्वारा शरीर के विभिन्न रोगों को समाप्त कर विशेष आनन्द कि प्राप्ति सकता है।
योगी अखिलेश
सकारात्मक विचार केंद्र

अहम् ब्रह्मास्मि – मै ब्रह्म हूं

तुम्हारा भटकना स्वाभाविक है क्यों कि तुम अब तक ईश्वर को नहीं जानते। अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मै ब्रह्म हूं अर्थात मै ही अपने जीवन का निर्माणकर्ता हूं। तुम ईश्वर को स्वयं महसूस करो, न की दूसरे के अनुभव से। हमारा उद्देश्य है की मानव अपनी समस्या के लिए किसी अन्य के पास न भटके, बल्कि स्वयं निदान करे।  जिस प्रकार से बिना प्रकाश के बल्ब का कोई महत्व नहीं होता, उसी प्रकार ईश्वर ज्ञान बिना इस शरीर का कोई महत्व नहीं। तुम अपने प्रकाश के लिए दूसरे से ऊर्जा लेना चाहते हो और इधर उधर भटकते हो क्यों कि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे अंदर ही ऊर्जा का भंडार है। बस तुमने उसका उपयोग नहीं लिया। विभिन्न ज्ञान हमारे पूर्वजों द्वारा ग्रंथों मे समाहित कर दिए गए थे ताकि मनुष्य अपने ज्ञान द्वारा शारीरिक भोग करते हुए ईश्वर प्राप्ती कर सके। हमने यहां "सनातन पुस्तक ज्ञान संग्रह" मे पुरातन वेद पुराण शास्त्र रामायण महाभारत मंत्र तंत्र यंत्र सम्मोहन ज्योतिष चिकित्सा लाल किताब तथा विभिन्न पुरातन पुस्तकों को संग्रहित किया है। ताकि मनुष्य स्वयं अपनी समस्या का निदान करने मे सक्षम बने। हमारा सकारात्मक विचार है कि विशेष ज्ञान सिर्फ पुस्तकों या कुछ विशेष लोगों तक ही सीमित न रहे बल्कि आम इंसान तक पहुचे। वह मनुष्य जो सिर्फ लेने कि ही भावना रखता है देने कि नहीं, ऐसा मनुष्य शारीरिक रूप से तो मनुष्य, परन्तु आत्म रूप से पशु है। हमारा सकारात्मक विचार है मनुष्य विभिन्न ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म हो। 

तंत्र मंत्र यंत्र पुरातन ज्ञान

सनातन पुस्तक ज्ञान संग्रह

वेद

वेद ईश्वर कि वाणी है

पुराण

विभिन्न भाषाओ मे

रामायण

विभिन्न भाषाओ मे

महाभारत

विभिन्न भाषाओ मे

अचला मोहनी

अचला मोहनी

ॐ सर्वश्रेष्ठ मंत्र क्यों
सामान्यता हमारी प्रत्येक श्वास प्रक्रिया 4 सेकंड मे पूरी होती है अर्थात 24 घंटे मे हम 21600 बार स्वास लेते हैं। प्रत्येक स्वास मे वायु 'हं' कि ध्वनि से बाहर जाती है जिसे रेचक कहते हैं और 'स:' कि ध्वनि के साथ अंदर आती है जीसे पूरक कहा जाता है। अत: प्रत्येक प्राणी स्वभावता अचेतन रूप से 'हंस:' मंत्र का जाप करता है। 'हं' ध्वनि का अर्थ है मै और 'स:' ध्वनि का अर्थ है वह अर्थात ब्रह्म, परमात्मा या शिव और यदि इसके विपरीत रेचक के पहले पूरक को माना जाए तो मंत्र होता है 'सोSहं'। दोनों का अर्थ समान है- जीव का परमात्मा या परमात्मा का जीव से संबंध। यही वर्तमान मे  है। प्रत्येक प्राणी 'हं' ध्वनि के साथ बाहर जाता है और 'स:' ध्वनि के साथ अंदर प्रवेश करता है। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी स्वत: ही निरंतर इस मंत्र का जाप करता रहता है। 'हंस:' एवं 'सोSहं'। इसे अजपा गायत्री कहते हैं और यह गायत्री मंत्र का सर्वश्रेष्ठ रूप माना जाता है। गायत्री का अर्थ है एक पवित्र गीत जिसके गाने से प्राणी समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। महर्षि विश्वामित्र ने प्राणायाम द्वारा स्वास रोक कर तप किया और ॐ कार, षटकार तथा चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर गायत्री मंत्र का अविस्कार किया। ये यजुर्वेद के मंत्र 'ॐ भूर्भुव: स्व:' और ऋग्वेद के छंद तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् से मिलकर बना है। महर्षि विश्वामित्र पूर्व मे क्षत्रिय राजा थे वे महर्षि वशिष्ठ कि नंदनी गाय कि अद्‌भुत शक्तियों द्वारा पराजित होने के पश्चात ही तप द्वारा महर्षि बने। विश्वामित्र सप्तऋषियों मे से एक हैं और आज भी ब्रह्मांड मे मौजूद हैं। "ईश्वर सर्व व्यापी है उसका कोई विशेष रूप या स्थान नहीं  इसी प्रकार हमारी आत्मा भी सर्वव्यापी और ईश्वर स्वरूप है।"
योगी अखिलेश
सकारात्मक विचार केंद्र
रुद्र पांडव हनुमान
पांडव वनवास काल के समय इस स्थान पर आए थे। ये एक विचित्र प्रकार का स्थान है क्यों कि पांडव यहां आनंद में नहीं आए थे। वे एक प्रकार कि हताशा मे और क्रोधित हुए यहां बैठे थे। तो यहां कि ऊर्जा आपकी की हुई कल्पना से बहुत अधिक है क्यों कि यहां पर उन्होंने अपना बहुत अधिक समय बिताया और इसी स्थान पर द्रोपदी ने श्री कृष्ण के ध्यान मुद्रा मे बैठे हुए प्रकट दर्शन किए थे और उसके बाद भी न जाने कितने हजार वर्षों तक कितने हजार ऋषि मुनियों ने यहां आकर ध्यान योग का अनुसरण किया। यहां एक अनोखी प्रणाली का रहस्य छिपा हुआ है।  जब मैने बुंदेलखंड सनातन वेद यात्रा के दौरान इस स्थान के विद्धुत चुंबकीय क्षेत्र (Electromagnetic Field) को मापा तो वह शून्य (Neutral) थी। इस प्रकार का विद्धुत चुंबकीय क्षेत्र मंगल गृह मे पाया जाता है। आज भी ये जगह वैसी ही है जैसे पहली थी। आपको कुछ जानने कि जरूरत नहीं। यह स्थान आपको शून्य कर देगा, आपके दिमाग कि विचलितता को खत्म करने मे सहायक होगा। समीप ही एक कुंड है जिसमे कमल के पुष्प खिले हुए हैं। इस कुंड का जल औसाधि युक्त है, इसे पीने से  हमारी पाचन क्रिया पुष्ट होकर भूख को बढ़ा देती है और रोगों को नष्ट करती है। जल कुंड के समीप ही द्रोपदी द्वारा स्थापित शिव स्थान है और उसी शिव मंदिर के सामने ही है यह शून्य स्थान जहां पर द्रोपदी ने श्री कृष्ण को योगी रूप मे ध्यान अवस्था मे बैठे हुए देखा था। वर्तमान मे इस स्थान पर श्री हनुमान जी कि मूर्ति स्थापित है। जिन्हे रूद्र पांडव हनुमान कहते हैं।
हम इस स्थान को सिर्फ दर्शन कि दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। हम इसके साथ ध्यान, योग या साधना को जोड़ना चाहते हैं। यदि हम अपने आपको रूपांतरित करना चाहे तो उसके लिए हमे विशेष ऊर्जा कि आवश्यकता होगी, नहीं तो ये बहुत मुस्किल होगा। यदि हमे इस प्रकार कि ऊर्जा उत्पन्न करनी हो तो उसके लिए हमे बहुत अधिक ध्यान, योग या साधना करनी पड़ेगी। परंतु इस स्थान पर वह सब प्रकृतिक रूप से रखा हुआ है। बस आपको यहां आँख बंद करके ध्यान मे बैठना भर है और इसके प्रति आपको थोड़ा ग्रहणशील होना है। यहां पर सनातन ऊर्जा आधार उपलब्ध है जो कभी खत्म होने वाला नहीं। यह ऊर्जा अक्षय है। आप यहां कुछ समय आँख बंद कर शांति से बैठने के बाद स्वयं को स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक होने से नहीं रोक पाएंगे और अध्यात्म ही सभी कष्टों से मुकती है।  
 भारत के मध्य प्रदेश के मध्य स्थान, ग्राम पांडाझिर जिला छतरपुर (म प्र ) 
मे स्थित है मंगल गृह कि भांति एलेक्ट्रोमाग्नेटिक फील्ड शून्य स्थान।
यहां पहुचने पर मंगल दोष स्वत: ही हो जाता  है समाप्त।
* योगी अखिलेश *
हमारे पितर देव 
श्री अयोध्या सिंह 
श्री रामचंद्र सिंह
श्री मंगल सिंह 
श्री धर्मदास सिंह
श्री राजेन्द्र सिंह 
योगी अखिलेश
*** सनातन  वेद यात्रा ***
सकारात्मक विचार केंद्र इंदौर से 'रुद्र पांडव हनुमान' शून्य विद्धुत क्षेत्र ग्राम पाड़ाझिर जिला छतरपुर तक
मर्यादा पुरषोत्तम क्षत्रिय श्री राम
इस पृथ्वी के प्रथम मनुष्य श्री मनु हैं।  मनु के 25 वे वंशज थे महाराज अरण्य। अरण्य और रावण का जब घोर युद्ध हुआ, तब मृत्यु के समय महाराज अरण्य ने रावण को श्राप दिया कि इच्छवाकू वंश मे जन्मा राजकुमार ही तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा। उन्ही मनु के 64 वें वंश मे श्री राम का जन्म हुआ। श्री राम कि पत्नी माता सीता थी। माता सीता ही महामाया है जिनका न कभी जन्म होता है और न ही मृत्यु बल्कि सिर्फ प्रकट्य और विलुप्ति ही होती है। ये वही महामाया हैं जिन्होंने दुर्गा रूप मे महिसासुर और चंडी रूप मे शुंभ-निशुंभ का वध किया और अजपा गायत्री रूप मे प्रत्येक जीवित शरीर मे निवास करतीं हैं।
विद्वान ब्राह्मण रावण
ब्रह्मा जी के परपौत्र, पुलस्त्य ऋषि के पौत्र और विश्रवा ऋषि के पुत्र थे रावण।  शिव भक्त रावण महाविद्वान, महाप्रतापी, महापराक्रमी और वेद-शास्त्र के महाज्ञानी थे। रावण कि पत्नि मंदोदरी अप्सरा हेमा कि पुत्री थीं। मंदोदरी को महर्षि कश्‍यप के पुत्र मायासुर ने गोद‍ लिया था। मंदोदरी उन पंच कन्याओ मे से एक हैं जिनका प्रतिदिन स्मरण करने से प्राणियों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। पंच कन्याओ का जन्म कोख से नहीं बल्कि किसी तत्व द्वारा प्रकट रूप मे होता है। ये पाँच कन्याये हैं अहिल्या (ऋषि गौतम की पत्नी), द्रौपदी (पांडवों की पत्नी), तारा (वानरराज बाली की पत्नी), कुंती (पांडु की पत्नी) तथा मंदोदरी (रावण की पत्नी)। 
AUDIO LIBRARY आडियो लाइब्रेरी

हनुमान बाहुक हिन्दी अर्थ पार्ट 1, 2, 3, 4, 5

हनुमान बाहुक पार्ट 1
हनुमान बाहुक पार्ट 2
हनुमान बाहुक पार्ट 3
हनुमान बाहुक पार्ट 4
हनुमान बाहुक पार्ट 5

शिव रुद्राभिषेक

शिव तांडव स्त्रोत्र

शिव नमस्कार मंत्र

श्रीमद्बाल्मिकी रामायण महात्मय

श्री बाल्मीकि रामायण महात्मय सभी काण्ड आडियो फॉर्मैट

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BHAGVAT GITA IN ENGLISH

पांडव गीता हिन्दी

महाभारत कथा एवं चक्रव्यूह गीता

विभिन्न सनातनी आडियो बुक एवं मंत्र

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यंत्र निर्माण

जिस प्रकार प्रत्येक प्राणी के रहने का एक निश्चित स्थान होता है उसी प्रकार से देवी देवताओ व अन्य शक्तियों का भी निवास स्थान है। इनही शक्तियों को मंत्रों द्वारा भोजपत्र या ताम्रपत्र मे स्थापित करना ही वास्तविकता मे यंत्र सिद्धि है। कुछ प्रमुख मंदिरों मे स्थापित यंत्र हैं बालाजी मे श्री यंत्र, जगन्नाथ मंदिर मे भैरवीचक्र यंत्र, श्रीनाथ जी के मंदिर मे सुदर्शन चक्र यंत्र। पाठक गण पुस्तक ज्ञान संग्रह से पुस्तक डाउनलोड कर स्वयं  यंत्र निर्माण कर सकते हैं।

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